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उत्तर प्रदेश में देशी गौवंश की घटती संख्या, गौ सेवा आयोग की कार्यप्रणाली, गौशालाओं की निगरानी, पशुधन गणना, भूसा खरीद में कथित अनियमितताओं और पारदर्शिता की मांग पर आधारित विस्तृत विशेष रिपोर्ट।

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यूपी में घट रहा देशी गौवंश? गौ सेवा आयोग, गौशालाओं और निगरानी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
यूपी में घट रहा देशी गौवंश? गौ सेवा आयोग, गौशालाओं और निगरानी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

गौ सेवा आयोग बनने के बाद क्यों घट रहे हैं देशी गौवंश? गौशालाओं, निगरानी व्यवस्था और पारदर्शिता पर उठ रहे गंभीर सवाल

विशेष संवाददाता | उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में देशी गौवंश की लगातार घटती संख्या चिंता का विषय बनती जा रही है। विभिन्न सामाजिक संगठनों, गौ संरक्षण से जुड़े लोगों, किसान प्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि प्रदेश में गौ सेवा आयोग के गठन के बाद गौवंश संरक्षण को लेकर बड़ी उम्मीदें जगी थीं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं। उनका दावा है कि देशी गौवंश की संख्या लगातार घट रही है और यदि प्रभावी संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में देशी नस्लें गंभीर संकट का सामना कर सकती हैं।

आयोग की गतिविधियां कार्यालयों तक सीमित रहने के आरोप

आलोचकों का कहना है कि गौ सेवा आयोग की अधिकांश गतिविधियां निरीक्षण, समीक्षा बैठकें, कार्यालयों और सर्किट हाउस तक ही सीमित होकर रह गई हैं। उनका आरोप है कि गांवों में संचालित गौशालाओं, बेसहारा गौवंश, नस्ल संरक्षण और जमीनी निगरानी पर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देती।

ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि आयोग के गठन का उद्देश्य गौवंश संरक्षण को मजबूत करना था, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में बेसहारा पशु खेतों और सड़कों पर घूमते दिखाई देते हैं।

किसानों के घरों से गौशालाओं तक... फिर कहां जाते हैं गौवंश?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसानों द्वारा छोड़े गए अथवा प्रशासन द्वारा पकड़कर गौशालाओं में भेजे गए गौवंश का आगे क्या होता है?

प्रदेश स्तर पर ऐसा कोई सार्वजनिक एवं समेकित रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध नहीं है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि गौशालाओं में पहुंचे कुल गौवंश की संख्या कितनी है, कितनों की मृत्यु हुई, कितनों का पुनर्वास हुआ तथा वर्तमान में कितने गौवंश संरक्षित हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्येक गौवंश की डिजिटल टैगिंग और ऑनलाइन ट्रैकिंग अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि हर पशु का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध हो सके।

ग्राम पंचायतों को संचालन, लेकिन निगरानी पर सवाल

प्रदेश के अधिकांश अस्थायी एवं ग्रामीण गौशालाओं का संचालन ग्राम पंचायतों और ग्राम प्रधानों के माध्यम से कराया गया। सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर गौशालाओं में अव्यवस्था, पशुओं के रखरखाव में लापरवाही, चारे की कमी और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें लगातार सामने आती रहीं।

आलोचकों का कहना है कि अनेक मामलों में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की खबरें सामने आने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई लगभग शून्य रही। उनका कहना है कि यदि समय-समय पर स्वतंत्र सामाजिक एवं वित्तीय ऑडिट कराया जाता तो स्थिति अधिक पारदर्शी हो सकती थी।

भूसा खरीद में कथित कमीशनखोरी के आरोप

गौ संरक्षण से जुड़े कुछ लोगों का आरोप है कि समय के साथ गौशालाओं के लिए भूसा आपूर्ति का एक बड़ा व्यापार विकसित हो गया। उनका दावा है कि कुछ तथाकथित "गौसेवक" स्वयं भूसा व्यापारी बन गए और गौशालाओं को ऊंचे दामों पर भूसा बेचने लगे।

आरोप यह भी लगाए जाते हैं कि कुछ स्थानों पर गौशालाओं के संचालन और भूसा खरीद के नाम पर ग्राम प्रधानों से कथित कमीशनखोरी का नेटवर्क विकसित हुआ, जिससे वास्तविक गौसेवा प्रभावित हुई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित विभागों द्वारा इन पर आधिकारिक प्रतिक्रिया आना शेष है।

पशुधन गणना के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

पशुपालन क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि वर्ष 2011 की पशुधन गणना की तुलना में हालिया पशुधन गणना के आंकड़े देशी गौवंश की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता पैदा करते हैं। उनका कहना है कि कई क्षेत्रों में देशी गौवंश की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जिससे संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो देशी गौवंश की कई नस्लें अस्तित्व के संकट में पहुंच सकती हैं। उनका कहना है कि वर्तमान स्थिति एक चेतावनी है और यदि संरक्षण, संवर्धन, वैज्ञानिक प्रजनन तथा किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां देशी गौवंश को केवल संरक्षण केंद्रों, अनुसंधान संस्थानों अथवा चिड़ियाघरों में ही देख पाएंगी।

पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि—

  • प्रत्येक गौवंश की डिजिटल टैगिंग और ऑनलाइन ट्रैकिंग अनिवार्य की जाए।

  • सभी गौशालाओं का वार्षिक सामाजिक एवं वित्तीय ऑडिट कराया जाए।

  • प्रत्येक जिले की गौशालाओं का सार्वजनिक डैशबोर्ड जारी किया जाए।

  • गौशालाओं में आए, मृत, स्थानांतरित एवं वर्तमान गौवंश का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।

  • भूसा एवं अन्य खरीद प्रक्रियाओं को पूर्णतः पारदर्शी बनाया जाए।

  • गौ सेवा आयोग के अधिकारियों के नियमित फील्ड निरीक्षण को अनिवार्य किया जाए।

आधिकारिक पक्ष

इस संबंध में उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग तथा संबंधित विभाग का विस्तृत पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा। यदि आयोग के पास गौवंश संरक्षण, गौशालाओं की स्थिति, पशुधन गणना अथवा अन्य आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हैं, तो उनके सार्वजनिक होने से वास्तविक स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

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    Anil Tiwari

    Anil Tiwari is a Senior Journalist with extensive experience in print, digital, and television journalism. He has covered a wide range of subjects, including governance, public policy, politics, rural development, environment, illegal mining, law and order, and social issues. His work is driven by factual reporting, investigative journalism, and in-depth analysis, with a strong commitment to public interest and ethical journalism. Over the years, he has consistently highlighted grassroots issues, giving voice to underserved communities through credible and impactful reporting.

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