निजी स्कूलों में शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर सवाल, हर साल महंगी किताबें, ड्रेस और अन्य खर्चों से परेशान अभिभावक। कमीशनबाजी के गंभीर आरोप, सरकार से कार्रवाई की मांग।
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निजी स्कूलों में शिक्षा का व्यवसाय: महंगी किताबें, ड्रेस और कमीशनबाजी पर उठे सवाल
देशभर में शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों में अभिभावकों ने निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि शिक्षा के नाम पर बच्चों और अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाला जा रहा है, जिसका पढ़ाई से सीधा संबंध भी नहीं होता।
हर साल बदलती किताबें और बढ़ता खर्च
अभिभावकों का कहना है कि जब पाठ्यक्रम एक समान होता है, तो हर साल किताबें और कॉपियां बदलने की क्या आवश्यकता है। कई निजी स्कूल अलग-अलग प्रकाशनों की महंगी किताबें अनिवार्य कर देते हैं, जिन्हें केवल स्कूल द्वारा बताए गए दुकानों से ही खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे अभिभावकों को आर्थिक रूप से नुकसान उठाना पड़ता है।
स्कूल ड्रेस और अन्य खर्च बने बोझ
सिर्फ किताबें ही नहीं, बल्कि अलग-अलग दिनों के लिए अलग ड्रेस, विशेष यूनिफॉर्म, जूते और अन्य तथाकथित सुविधाएं भी अभिभावकों के लिए फिजूलखर्ची का कारण बन रही हैं। इनका शिक्षा की गुणवत्ता से कोई सीधा संबंध नहीं होने के बावजूद इन्हें अनिवार्य कर दिया जाता है।
कमीशनबाजी के गंभीर आरोप
कुछ अभिभावकों ने स्कूल प्रबंधन पर कमीशनबाजी के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि स्कूल और दुकानदारों के बीच सांठगांठ के चलते महंगे दामों पर किताबें और अन्य सामग्री बेची जाती हैं, जिससे स्कूल को आर्थिक लाभ मिलता है। इस मुद्दे ने शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
RTE Act 2009 का नहीं हो रहा पालन, निजी स्कूलों पर सवाल
शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के बावजूद कई निजी स्कूल नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। अभिभावकों का आरोप है कि मनमानी फीस, महंगी किताबें और अन्य खर्च थोपे जा रहे हैं। 25% आरक्षण जैसे प्रावधान भी कई जगह लागू नहीं हो रहे। सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग उठ रही है।
सरकार पर उठ रहे सवाल
शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक लगाने की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन अभी तक इस दिशा में ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में अभिभावक संगठन लगातार सरकार से सख्त नियम बनाने और उनका पालन सुनिश्चित कराने की मांग कर रहे हैं।
समाधान की दिशा में क्या जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए सरकार को निजी स्कूलों पर सख्त नियंत्रण स्थापित करना होगा।
- सभी स्कूलों में एक समान पाठ्यक्रम और पुस्तकों की व्यवस्था
- किताबों और यूनिफॉर्म की कीमतों पर नियंत्रण
- पारदर्शी खरीद प्रक्रिया
- शिकायतों के लिए प्रभावी तंत्र
शिक्षा का उद्देश्य समाज का विकास और बच्चों का भविष्य संवारना है, लेकिन जब यह व्यवसाय का रूप ले लेता है, तो इसका असर सीधे आम लोगों पर पड़ता है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो शिक्षा आम आदमी की पहुंच से दूर होती चली जाएगी।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस गंभीर मुद्दे पर कब तक ठोस कदम उठाती है और अभिभावकों को राहत मिलती है या नहीं।
Anil Tiwari is a Senior Journalist with extensive experience in print, digital, and television journalism. He has covered a wide range of subjects, including governance, public policy, politics, rural development, environment, illegal mining, law and order, and social issues. His work is driven by factual reporting, investigative journalism, and in-depth analysis, with a strong commitment to public interest and ethical journalism. Over the years, he has consistently highlighted grassroots issues, giving voice to underserved communities through credible and impactful reporting.
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