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दवाइयों का पर्चा लिखने की राह पर फार्मासिस्ट: दुनिया बदल रही, भारत में अधिकारों की मांग तेज
ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी और झोलाछाप इलाज पर निर्भरता के बीच प्रशिक्षित फार्मासिस्टों को अतिरिक्त व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर तैनात करने के प्रस्ताव पर विचार जरूरी
लेखक: अनिल तिवारी
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों की कमी, सरकारी अस्पतालों में मरीजों की लंबी कतारें और ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज की सीमित सुविधाएं लंबे समय से चुनौती बनी हुई हैं। खासकर दूरदराज गांवों और देहातों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति चिंताजनक है। कई जगह डॉक्टरों की तैनाती न के बराबर है, स्वास्थ्य केंद्र नियमित रूप से संचालित नहीं हो रहे और मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है—क्या योग्य फार्मासिस्टों को अतिरिक्त प्रशिक्षण देकर ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है?
दुनिया के कई देशों में फार्मासिस्टों की भूमिका अब केवल डॉक्टर की पर्ची पर दवा देने तक सीमित नहीं है। अतिरिक्त प्रशिक्षण, निर्धारित योग्यता और कानूनी अनुमति के आधार पर उन्हें कुछ बीमारियों में दवा लिखने और उपचार प्रबंधन की जिम्मेदारी दी जा रही है। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में अलग-अलग रूपों में यह व्यवस्था विकसित हुई है।
भारत में भी इस विषय पर गंभीर नीतिगत चर्चा की जरूरत है। सवाल केवल फार्मासिस्टों के अधिकारों का नहीं, बल्कि यह भी है कि जब देश में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध हैं, तो उनकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल मरीजों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए क्यों न किया जाए?
ब्रिटेन में फार्मासिस्टों की भूमिका में बड़ा बदलाव
ब्रिटेन में फार्मासिस्टों को स्वतंत्र रूप से दवाएं लिखने का अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। निर्धारित प्रशिक्षण और पेशेवर मानकों को पूरा करने वाले फार्मासिस्ट स्वतंत्र प्रिस्क्राइबर के रूप में काम कर सकते हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक मरीजों की पहुंच बढ़ाना और सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के लिए डॉक्टरों पर पड़ने वाला दबाव कम करना है। हालांकि, यह अधिकार निर्धारित योग्यता, पेशेवर मानकों और लागू नियमों के अधीन है।
कनाडा में सामान्य बीमारियों के उपचार में फार्मासिस्टों की भूमिका
कनाडा में फार्मासिस्टों के अधिकार प्रांतों के अनुसार अलग-अलग हैं। ओंटारियो सहित कुछ प्रांतों में फार्मासिस्ट निर्धारित सामान्य बीमारियों का आकलन कर उनके उपचार के लिए कुछ दवाएं लिख सकते हैं।
इस व्यवस्था से मरीजों को सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के लिए समय पर सहायता मिल सकती है। वहीं, गंभीर लक्षणों या जटिल बीमारियों की स्थिति में मरीज को चिकित्सक के पास भेजना भी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी बढ़ रही जिम्मेदारी
अमेरिका में कुछ राज्यों में फार्मासिस्टों को चिकित्सकों के साथ सहयोगात्मक समझौतों के तहत दवाओं की खुराक में बदलाव, उपचार प्रबंधन और कुछ दवाओं को दोबारा जारी करने जैसी जिम्मेदारियां दी जाती हैं।
ऑस्ट्रेलिया में भी कुछ क्षेत्रों में सीमित प्रिस्क्राइबिंग कार्यक्रमों के माध्यम से फार्मासिस्टों की भूमिका बढ़ाई जा रही है। हालांकि, इन देशों में अधिकारों और नियमों की व्यवस्था एक जैसी नहीं है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि फार्मासिस्टों की विशेषज्ञता का उपयोग स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान, पर्याप्त प्रशिक्षण और मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि हैं।
गांवों में डॉक्टर नदारद, झोलाछाप इलाज पर निर्भरता
भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जहां लोगों को सबसे अधिक सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है, वहीं कई दूरदराज इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता बेहद सीमित है। अनेक स्थानों पर सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र चिकित्सकों की कमी, कर्मचारियों की अनुपस्थिति अथवा आवश्यक सुविधाओं के अभाव से प्रभावित हैं।
परिणाम यह है कि सामान्य बीमारी होने पर भी ग्रामीण मरीजों को इलाज के लिए दूर जाना पड़ता है। आर्थिक और भौगोलिक मजबूरियों के कारण कई लोग ऐसे व्यक्तियों से इलाज कराने लगते हैं जिनके पास मान्य चिकित्सकीय योग्यता नहीं होती। यह स्थिति मरीजों के स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
सवाल यह है कि जब गांवों में योग्य डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं, तब सरकार प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता का बेहतर उपयोग करने के लिए ठोस पहल क्यों नहीं करती?
ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए केवल अस्पतालों की इमारतें बनाना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि स्वास्थ्य केंद्र नियमित रूप से संचालित हों, वहां योग्य कर्मचारी तैनात हों और मरीजों को समय पर उचित उपचार मिल सके।
अतिरिक्त प्रशिक्षण देकर फार्मासिस्टों की हो सकती है तैनाती
इस समस्या के समाधान के लिए योग्य फार्मासिस्टों को अतिरिक्त व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात करने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
फार्मासिस्टों को दवाओं के प्रभाव, उनके सही इस्तेमाल, दवाओं के आपसी संबंध और दवा-सुरक्षा का ज्ञान होता है। उचित प्रशिक्षण के साथ उनकी भूमिका को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
प्रस्तावित व्यवस्था में फार्मासिस्टों को सामान्य बीमारियों की पहचान, प्राथमिक स्तर पर मरीज के आकलन, आवश्यक जांच की पहचान, दवा-सुरक्षा और गंभीर मामलों को चिकित्सक के पास रेफर करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
यदि आवश्यक कानूनी बदलाव किए जाएं, तो निर्धारित योग्यता और मूल्यांकन पूरा करने वाले फार्मासिस्टों को सीमित कार्यक्षेत्र में जिम्मेदारी देने की संभावनाओं का परीक्षण किया जा सकता है। इससे ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, फार्मासिस्टों की तैनाती डॉक्टरों की आवश्यकता समाप्त करने का विकल्प नहीं हो सकती। गंभीर बीमारियों के निदान, जटिल उपचार और आपातकालीन चिकित्सा के लिए योग्य चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना अनिवार्य रहेगा।
क्या Pharm.D धारकों को मिल सकता है अवसर?
क्लिनिकल फार्मेसी और Pharm.D जैसे पाठ्यक्रमों में दवाओं के प्रभाव, दवाओं के आपसी संबंध, दवा-सुरक्षा और मरीजों के उपचार में फार्मासिस्ट की भूमिका का अध्ययन कराया जाता है।
ऐसे में नीतिगत स्तर पर यह विचार किया जा सकता है कि अतिरिक्त प्रशिक्षण और निर्धारित मूल्यांकन पूरा करने वाले योग्य फार्मासिस्टों के लिए सीमित प्रिस्क्राइबिंग व्यवस्था विकसित की जाए।
इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें आवश्यक होंगी:
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विशेष प्रशिक्षण: मरीज के आकलन, दवा चयन और संभावित दुष्प्रभावों की पहचान का व्यावहारिक प्रशिक्षण।
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सीमित अधिकार: केवल अधिसूचित सामान्य बीमारियों और अनुमत दवाओं तक प्रिस्क्रिप्शन का अधिकार।
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रेफरल व्यवस्था: गंभीर लक्षणों और जटिल बीमारियों में मरीज को चिकित्सक के पास भेजना।
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जवाबदेही: लाइसेंस, उपचार का रिकॉर्ड, नियमित मूल्यांकन और गलत उपचार की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना।
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निगरानी: सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों और संबंधित नियामक संस्थाओं के माध्यम से व्यवस्था का नियमित निरीक्षण।
ऐसी व्यवस्था लागू करने के लिए संबंधित कानूनों और नियमों में आवश्यक बदलाव तथा सक्षम प्राधिकारियों की मंजूरी जरूरी होगी।
भारत में फार्मासिस्टों के अधिकारों की कानूनी स्थिति
भारत में फार्मासिस्ट स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और मेडिकल स्टोरों पर उनकी भूमिका दवाओं के वितरण, सही इस्तेमाल की जानकारी और दवा-सुरक्षा से जुड़ी होती है।
लेकिन केवल पंजीकृत फार्मासिस्ट होने के आधार पर स्वतंत्र रूप से बीमारी का निदान कर दवाओं का प्रिस्क्रिप्शन लिखने का सामान्य कानूनी अधिकार नहीं मिलता। फार्मेसी एक्ट, 1948 और चिकित्सा से संबंधित अन्य लागू कानूनों एवं नियमों के अंतर्गत फार्मेसी के कार्य और चिकित्सा करने के अधिकारों की अलग-अलग सीमाएं निर्धारित हैं।
इसलिए भारत में फार्मासिस्टों को सीमित प्रिस्क्रिप्शन अधिकार देने के लिए केवल प्रशासनिक आदेश पर्याप्त होंगे या कानूनों में बदलाव की जरूरत पड़ेगी, इसका निर्धारण संबंधित कानूनी प्रावधानों की समीक्षा के बाद ही किया जा सकता है।
केंद्र सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय, फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया, चिकित्सा नियामक संस्थाओं और फार्मासिस्ट संगठनों के बीच इस विषय पर संवाद आवश्यक है।
एंटीबायोटिक व अन्य प्रतिबंधित दवाओं के दुरुपयोग पर रोक भी जरूरी
फार्मासिस्टों को अधिक अधिकार देने की चर्चा में मरीजों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। भारत में एंटीबायोटिक दवाओं का अनुचित इस्तेमाल और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी रोगाणुओं में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है।
इसलिए किसी भी प्रस्तावित व्यवस्था में एंटीबायोटिक और अन्य प्रतिबंधित दवाओं के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम, निगरानी और जवाबदेही जरूरी होगी। दवाओं की जानकारी के साथ मरीज की स्थिति का सही आकलन और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय जांच भी महत्वपूर्ण है।
फार्मासिस्टों को अधिकार देने का उद्देश्य डॉक्टरों का विकल्प तैयार करना नहीं, बल्कि योग्य पेशेवरों की सहायता से स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और सुरक्षित बनाना होना चाहिए।
सरकार को गांवों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर लेना होगा फैसला
दुनिया के विभिन्न देशों के अनुभव भारत में इस विषय पर गंभीर अध्ययन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। ग्रामीण भारत में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने, सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को नियमित रूप से संचालित करने और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की सेवाओं का बेहतर उपयोग करने के लिए ठोस नीति की जरूरत है।
सरकार को यह भी देखना चाहिए कि क्या अतिरिक्त व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त फार्मासिस्टों को निर्धारित कानूनी अधिकारों के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल करने से ग्रामीण मरीजों को लाभ पहुंच सकता है।
सवाल सीधा है—जब गांवों में डॉक्टरों की कमी है, सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में उपचार की सुविधाएं सीमित हैं और मरीजों को मजबूरी में झोलाछाप इलाज पर निर्भर होना पड़ता है, तो प्रशिक्षित फार्मासिस्टों की क्षमता का उपयोग करने के विकल्प पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं होना चाहिए?
इसका समाधान बिना पर्याप्त प्रशिक्षण और कानूनी सुरक्षा के अधिकार देने में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों, स्पष्ट कार्यक्षेत्र, प्रभावी निगरानी और जवाबदेही के साथ एक व्यवहार्य मॉडल विकसित करने में है।
ग्रामीण भारत को केवल अस्पतालों की इमारतें नहीं, बल्कि समय पर उपचार देने वाला प्रशिक्षित मानव संसाधन चाहिए। फार्मासिस्टों की योग्यता का नियमानुसार उपयोग इस दिशा में एक संभावित कदम हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य नीति का केंद्र मरीज हो और गांव के अंतिम व्यक्ति तक सुरक्षित उपचार पहुंचाने को प्राथमिकता दी जाए।

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