वरिष्ठ पत्रकार एवं बांदा प्रेस ट्रस्ट के ट्रस्टी अनिल तिवारी ने पत्रकारों के लिए विधान परिषद और राज्यसभा में प्रतिनिधित्व की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आवाज़ सदन में उठाने के लिए अलग प्रतिनिधित्व आवश्यक है।
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पत्रकारों को भी मिले विधान परिषद और राज्यसभा में प्रतिनिधित्व, अनिल तिवारी ने उठाई मांग
पत्रकारों के प्रतिनिधि भी हों विधान परिषद एवं राज्यसभा में
"जब सभी वर्गों के अपने जनप्रतिनिधि हैं, तो पत्रकारों का प्रतिनिधि सदन में क्यों नहीं?" – अनिल तिवारी
बांदा। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों के लिए विधान परिषद एवं राज्यसभा में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किए जाने की मांग उठी है। वरिष्ठ पत्रकार एवं बांदा प्रेस ट्रस्ट के ट्रस्टी अनिल तिवारी ने कहा कि जब स्थानीय निकाय, स्नातक एवं शिक्षक वर्ग सहित विभिन्न वर्गों के हितों की रक्षा और उनकी आवाज़ को सदन तक पहुंचाने के लिए विशेष प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है, तो देश के पत्रकारों के लिए भी ऐसा प्रावधान होना चाहिए, जिससे वे अपने बीच से प्रतिनिधि चुनकर उच्च सदनों में भेज सकें।
उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में विधान परिषद में स्थानीय निकाय, स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से सदस्य चुने जाते हैं। इनका उद्देश्य संबंधित वर्गों की समस्याओं और हितों को सदन में प्रभावी ढंग से उठाना है। लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में कार्य करने वाले पत्रकारों के लिए ऐसा कोई संवैधानिक या वैधानिक प्रावधान नहीं है, जबकि पत्रकार समाज और सरकार के बीच सूचना का सेतु बनकर लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अनिल तिवारी ने कहा कि पत्रकार जनता की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुंचाते हैं और जनहित के मुद्दों को उजागर करते हैं। इसके बावजूद जब स्वयं पत्रकारों की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, पेंशन, प्रशिक्षण, फर्जी मुकदमों, उत्पीड़न तथा मीडिया की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे सामने आते हैं, तब उनकी आवाज़ को सदन में मजबूती से उठाने वाला कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं होता।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पत्रकारिता की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा तथा मीडिया पर विभिन्न प्रकार के दबाव और प्रतिबंधों को लेकर देशभर में लगातार बहस होती रहती है। ऐसे में यह गंभीर प्रश्न है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को विधानमंडलों और संसद में प्रभावी ढंग से कौन उठाएगा। उनका मानना है कि यदि पत्रकारों का अपना प्रतिनिधि उच्च सदनों में होगा, तो वह पत्रकारों के अधिकारों, प्रेस की स्वतंत्रता, कार्यस्थल की सुरक्षा और मीडिया से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को संस्थागत रूप से सदन में रख सकेगा।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार समाज के अन्य वर्गों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व प्राप्त है, उसी प्रकार पत्रकारों को भी अपने बीच से योग्य एवं अनुभवी प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलना चाहिए। इससे पत्रकारों के हितों की रक्षा के साथ-साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी संस्थागत मजबूती मिलेगी।
अनिल तिवारी ने केंद्र एवं राज्य सरकारों से इस विषय पर गंभीरता से विचार करने तथा पत्रकारों के प्रतिनिधित्व के लिए आवश्यक संवैधानिक एवं विधिक विकल्पों का अध्ययन कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी और अधिक सशक्त होगा, जब लोकतंत्र के चारों स्तंभों को समान सम्मान, सुरक्षा और प्रभावी प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा।
उन्होंने बताया कि बांदा प्रेस ट्रस्ट इस विषय पर देशभर के पत्रकार संगठनों से संवाद स्थापित करेगा तथा व्यापक सहमति बनने के बाद केंद्र एवं राज्य सरकारों को ज्ञापन भेजकर पत्रकारों के लिए विधान परिषद एवं राज्यसभा में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग करेगा।
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