जेनेरिक दवाओं पर सबसे बड़ा सवाल: क्या मरीजों की जेब बचाने वाली सरकारी योजना को कमजोर कर रहा है दवा कारोबार का गठजोड़?
देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और आम नागरिक की पहुंच में लाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना शुरू की। सरकार का दावा है कि जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता के मानकों पर खरी उतरती हैं और महंगी ब्रांडेड दवाओं का किफायती विकल्प हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर तस्वीर अलग दिखाई देती है। आज भी अधिकांश मरीजों के हाथ में ऐसी पर्ची होती है जिसमें केवल महंगे ब्रांड का नाम लिखा होता है और जेनेरिक विकल्प का कोई उल्लेख नहीं होता।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है—यदि सरकार स्वयं जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा दे रही है, तो मरीज तक यह संदेश क्यों नहीं पहुंच रहा?
क्या मरीजों को जानबूझकर भ्रमित किया जा रहा है?
देश के विभिन्न राज्यों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि मरीजों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि "जेनेरिक दवा असर नहीं करती", "सस्ती दवा घटिया होती है" या "ब्रांडेड दवा ही असली इलाज है"।
यदि यह धारणा वैज्ञानिक तथ्यों के बजाय व्यावसायिक हितों के कारण बनाई जा रही है, तो यह केवल मरीजों की जेब पर बोझ नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति पर भी गंभीर प्रश्न है।
डॉक्टरों की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में
स्वास्थ्य व्यवस्था पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में मरीजों का आरोप होता है कि उन्हें एक निश्चित ब्रांड की दवा लिखी जाती है और कई बार किसी विशेष मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने का मौखिक सुझाव भी दिया जाता है। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह चिकित्सकीय पारदर्शिता और नैतिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
कुछ मरीजों का यह भी दावा है कि जब वे जन औषधि या जेनेरिक विकल्प की बात करते हैं तो उन्हें हतोत्साहित किया जाता है। ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि इनमें सच्चाई है तो यह केवल मरीज का आर्थिक शोषण नहीं बल्कि सरकार की सस्ती दवा नीति को भी कमजोर करता है।
सरकारी नीति और जमीनी हकीकत में इतना अंतर क्यों?
सरकार लगातार जेनेरिक दवाओं के उपयोग को बढ़ावा देने, जन औषधि केंद्रों के विस्तार और इलाज का खर्च कम करने की बात करती है। दूसरी ओर, बड़ी संख्या में मरीज आज भी हजारों रुपये की ब्रांडेड दवाएं खरीदने को विवश हैं।
क्या इसका कारण केवल जागरूकता की कमी है, या फिर स्वास्थ्य व्यवस्था के कुछ हिस्सों में ऐसी प्रवृत्तियां मौजूद हैं जिनकी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए? यह प्रश्न अब गंभीर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका है।
जेनेरिक और ब्रांडेड दवा में वास्तविक अंतर क्या है?
दवा विज्ञान के अनुसार जब कोई कंपनी नई दवा विकसित करती है, तो उसे सीमित अवधि के लिए पेटेंट अधिकार मिलता है। पेटेंट समाप्त होने के बाद अन्य कंपनियां भी उसी सक्रिय तत्व API (Active Pharma Ingredient) और निर्धारित गुणवत्ता मानकों के साथ दवा बना सकती हैं। यही जेनेरिक दवाएं होती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि दवा नियामकीय मानकों को पूरा करती है, तो केवल उसकी कीमत कम होने का अर्थ यह नहीं कि वह कम प्रभावी है। कई मामलों में अंतर केवल ब्रांड, प्रचार और पैकेजिंग का होता है।
फार्मा उद्योग पर भी उठते रहे हैं सवाल
स्वास्थ्य क्षेत्र में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि दवा उद्योग में ब्रांड प्रचार, विपणन और डॉक्टरों तक पहुंच बनाने पर भारी खर्च किया जाता है। इस कारण समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि डॉक्टरों और दवा कंपनियों के बीच वित्तीय संबंधों में अधिक पारदर्शिता लाई जाए और मरीजों को उपलब्ध सभी उपयुक्त विकल्पों की जानकारी दी जाए।
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब और मध्यम वर्गीय मरीज को होता है, जो इलाज के लिए कर्ज लेता है, जमीन बेचता है या अपनी जीवनभर की बचत खर्च कर देता है। यदि उसे समान गुणवत्ता की दवा कम कीमत पर मिल सकती थी, लेकिन उसकी जानकारी नहीं दी गई, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था के उद्देश्य पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
क्या होनी चाहिए कार्रवाई?
- विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि
- चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन में जहां संभव हो, साल्ट नेम स्पष्ट रूप से लिखा जाए।
- मरीजों को जेनेरिक विकल्पों की जानकारी दी जाए।
यदि किसी विशेष ब्रांड या मेडिकल स्टोर को अनुचित तरीके से बढ़ावा देने की शिकायत मिले तो उसकी निष्पक्ष जांच हो।
मेडिकल काउंसिल और औषधि नियामक संस्थाएं समय-समय पर ऑडिट करें।
देश का सबसे बड़ा सवाल
जब सरकार खुद कह रही है कि जन औषधि केंद्रों की जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता मानकों पर खरी हैं, तो फिर देश के करोड़ों मरीज आज भी महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदने के लिए क्यों मजबूर हैं? क्या यह केवल भ्रम है, या व्यवस्था के भीतर मौजूद कुछ ऐसी कमियां हैं जिनकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच समय की मांग बन चुकी है?
नोट: इस रिपोर्ट में सार्वजनिक रूप से उठती शिकायतों, स्वास्थ्य नीति और विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त सामान्य चिंताओं का उल्लेख है। किसी व्यक्ति, चिकित्सक, अस्पताल या संस्था विशेष के विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं माने जाने चाहिए जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांच में उनकी पुष्टि न हो।