लाखों का बजट खर्च, फिर भी विकास प्रदर्शनी से जनता नदारद; पोस्टरों में विकास देखने में भी दिलचस्पी नहीं

बांदा। केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के विकास कार्यों एवं जनकल्याणकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा पं. जे.एन. पीजी कॉलेज, बांदा में विकास प्रदर्शनी लगाई गई है। सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों के प्रचार-प्रसार पर लाखों रुपये का बजट खर्च किए जाने की बात कही जा रही है, लेकिन प्रदर्शनी स्थल की तस्वीर इसके उद्देश्य और प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
प्रदर्शनी का उद्घाटन होने के बावजूद आम आदमी इसे देखने नहीं पहुंच रहा है। स्थिति यह है कि विकास कार्यों और सरकारी उपलब्धियों को पोस्टरों में देखने में भी लोगों की कोई खास दिलचस्पी नजर नहीं आ रही। प्रदर्शनी स्थल पर जनता के बजाय इसकी देखरेख में लगे दो दैनिक कर्मचारी ही दिखाई दे रहे हैं।
लाखों खर्च, लेकिन प्रदर्शनी देखने वाला कोई नहीं
सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों के प्रचार के लिए सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को बजट उपलब्ध कराया जाता है। बांदा में लगाई गई इस प्रदर्शनी के आयोजन और प्रचार पर यदि लाखों रुपये खर्च किए गए हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसका वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है?
जब आम आदमी प्रदर्शनी देखने ही नहीं पहुंच रहा, तो सरकारी धन से आयोजित ऐसे प्रचार कार्यक्रमों की सार्थकता और प्रभाव का मूल्यांकन भी जरूरी हो जाता है।
लाखों का बजट खर्च होने के बावजूद आम आदमी का प्रदर्शनी तक न पहुंचना और पोस्टरों में दिखाए जा रहे विकास को देखने में भी रुचि न लेना सरकारी प्रचार तंत्र के सामने बड़ा सवाल है।
क्या जनता पोस्टर नहीं, धरातल पर विकास देखना चाहती है?
प्रदर्शनी की खाली पड़ी जगह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है—क्या जनता अब पोस्टर और प्रचार सामग्री में विकास देखने के बजाय धरातल पर विकास का अनुभव करना चाहती है?
सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, रोजगार, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति आम आदमी के लिए विकास की वास्तविक कसौटी होती है। ऐसे में केवल पोस्टरों पर योजनाओं और उपलब्धियों का प्रदर्शन जनता को कितना आकर्षित कर पा रहा है, बांदा की इस प्रदर्शनी की स्थिति इस पर सवाल उठा रही है।
विकास कार्यों को लेकर जनता की दिलचस्पी पर भी सवाल
प्रदर्शनी में एक भी आम व्यक्ति का नजर न आना इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि पूरे बांदा जनपद की जनता सरकार के विकास कार्यों में रुचि नहीं रखती। लेकिन प्रदर्शनी स्थल की स्थिति से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि इस आयोजन के माध्यम से सरकार के विकास कार्यों को देखने के लिए अपेक्षित जनभागीदारी नहीं बन पाई है।
यही स्थिति सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की रणनीति पर भी सवाल खड़ा करती है। यदि सरकार के विकास कार्यों को जन-जन तक पहुंचाना उद्देश्य है, तो केवल प्रदर्शनी लगा देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि सूचना वास्तव में कितने लोगों तक पहुंची और कितने लोग आयोजन से जुड़े।
बजट खर्च करना ही उद्देश्य या जनता तक सूचना पहुंचाना?
सबसे बड़ा सवाल सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की जवाबदेही का है। किसी सरकारी आयोजन की सफलता केवल इस आधार पर तय नहीं हो सकती कि प्रदर्शनी लगा दी गई, पोस्टर लगा दिए गए और निर्धारित बजट खर्च हो गया।
उसकी वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब आम नागरिक उससे जुड़े और उसे सरकारी योजनाओं एवं विकास कार्यों की उपयोगी जानकारी मिले।
पं. जे.एन. पीजी कॉलेज, बांदा में लगी विकास प्रदर्शनी में आम जनता की गैरमौजूदगी यही सवाल छोड़ रही है—लाखों रुपये खर्च कर पोस्टरों पर विकास दिखाने की कवायद आखिर किसके लिए है, जब उसे देखने के लिए आम आदमी ही नहीं पहुंच रहा?
प्रचार, सूचना और जनसंपर्क के माध्यम से सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाई जा सकती हैं, लेकिन जनता की कसौटी पर किसी विकास कार्य की वास्तविक परीक्षा अंततः धरातल पर ही होती है।