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बांदा में निजी अस्पतालों की निगरानी पर सवाल, डॉक्टर की गैरमौजूदगी में कौन करा रहा डिलीवरी व गर्भपात?

बांदा में निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। डॉक्टर की गैरमौजूदगी, प्रशिक्षित स्टाफ, बायोमेट्रिक उपस्थिति और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही को लेकर पड़ताल।

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पड़ताल: डॉक्टर दूसरे जिले में, फिर कौन करा रहा डिलीवरी और गर्भपात ?

निजी अस्पतालों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल—बिना डॉक्टर, प्रशिक्षित स्टाफ और जरूरी सुविधाओं के प्रसव व गर्भसमापन की शिकायतों की निष्पक्ष जांच जरूरी

बांदा। जिले में संचालित कुछ निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिकों की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल केवल किसी एक संस्थान का नहीं, बल्कि उस पूरी निगरानी व्यवस्था का है, जिसके तहत किसी निजी अस्पताल के पंजीकरण में एक डॉक्टर का नाम दर्ज है, लेकिन यदि वही डॉक्टर नियमित रूप से जिले में उपलब्ध नहीं रहते अथवा दूसरे जिले में निवास करते हैं, तो अस्पताल में प्रसव, सीजर, ऑपरेशन अथवा गर्भसमापन जैसी सेवाएं आखिर किसकी निगरानी में संचालित होती हैं?

प्रसव और गर्भसमापन जैसी चिकित्सा सेवाओं में योग्य चिकित्सक, प्रशिक्षित स्टाफ और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में कागजों पर दर्ज चिकित्सक और अस्पताल में वास्तविक समय पर उपलब्ध चिकित्सक के बीच अंतर है या नहीं, इसकी जांच स्वास्थ्य विभाग के लिए प्राथमिकता होनी चाहिए।

पंजीकरण में डॉक्टर एक, अस्पताल में मौजूद कौन?

जिले में निजी चिकित्सा संस्थानों के निरीक्षण के दौरान सबसे पहले यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि पंजीकरण प्रमाणपत्र में दर्ज चिकित्सक वास्तव में संस्थान में किस समय और कितने समय उपलब्ध रहते हैं।

यदि किसी अस्पताल में प्रसव, सीजर, गर्भसमापन अथवा अन्य गंभीर चिकित्सकीय प्रक्रिया हो रही है तो संबंधित दिन की ड्यूटी रोस्टर, डॉक्टर की उपस्थिति, मरीज का मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन नोट, प्रिस्क्रिप्शन और स्टाफ की उपस्थिति की जांच से काफी कुछ स्पष्ट हो सकता है।

सवाल यह है कि यदि पंजीकृत डॉक्टर दूसरे जिले में रहते हैं या नियमित रूप से वहां उपलब्ध नहीं हैं, तो उनकी अनुपस्थिति में मरीजों का उपचार कौन करता है?

बिना डॉक्टर और प्रशिक्षित स्टाफ के कौन करा रहा प्रसव?

यदि किसी निजी अस्पताल में प्रसव कराया जा रहा है तो वहां योग्य चिकित्सक के साथ आवश्यक प्रशिक्षित स्टाफ, आपातकालीन व्यवस्था, दवाएं, उपकरण और मरीज की निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए।

लेकिन यदि निरीक्षण के दौरान डॉक्टर मौके पर नहीं मिलते और प्रशिक्षित पंजीकृत स्टाफ भी उपलब्ध नहीं है, तो यह गंभीर जांच का विषय है कि मरीजों का उपचार वास्तव में कौन कर रहा है।

क्या केवल पंजीकरण के लिए डॉक्टर का नाम इस्तेमाल किया जा रहा है?

क्या डॉक्टर की अनुपस्थिति में कोई अन्य व्यक्ति मरीजों का उपचार कर रहा है?

क्या अस्पताल में तैनात बताए गए कर्मचारियों की योग्यता और पंजीकरण का सत्यापन हुआ है?

इन सवालों का जवाब अस्पताल के रिकॉर्ड और मौके पर होने वाली जांच से ही मिल सकता है।

गर्भपात को लेकर और गंभीर सवाल

गर्भसमापन के मामलों में निगरानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। संबंधित कानूनों और नियमों के तहत निर्धारित परिस्थितियों में अनुमोदित संस्थान और योग्य चिकित्सक की भूमिका आवश्यक है।

ऐसे में यदि किसी निजी संस्थान में नियमित रूप से गर्भसमापन सेवाएं दी जा रही हैं तो स्वास्थ्य विभाग को यह देखना चाहिए कि संस्थान को संबंधित सेवा के लिए विधिवत अनुमति प्राप्त है या नहीं, सेवा देने वाला चिकित्सक निर्धारित योग्यता और पंजीकरण रखता है या नहीं और मरीजों के रिकॉर्ड एवं आवश्यक दस्तावेज नियमानुसार रखे जा रहे हैं या नहीं।

साथ ही आपात स्थिति में मरीज को उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर करने की व्यवस्था और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता का भी सत्यापन जरूरी है।

निजी अस्पतालों में भी ऑनलाइन बायोमेट्रिक क्यों नहीं?

निजी अस्पतालों में डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ की वास्तविक उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए ऑनलाइन बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम लागू करने की मांग गंभीरता से विचार करने योग्य है।

यदि किसी निजी अस्पताल में पंजीकृत डॉक्टर सीमित समय के लिए उपलब्ध रहते हैं, जबकि अस्पताल 24 घंटे मरीजों को भर्ती करने और उपचार देने का दावा करता है, तो मरीजों की सुरक्षा के लिए वास्तविक ड्यूटी रिकॉर्ड आवश्यक है।

बायोमेट्रिक प्रणाली को जिला स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था से जोड़कर यह देखा जा सकता है कि पंजीकृत डॉक्टर और घोषित स्टाफ वास्तव में किस दिन और कितने समय संस्थान में मौजूद रहे।

कई घटनाओं के बाद भी निगरानी पर सवाल

स्थानीय स्तर पर समय-समय पर निजी अस्पतालों में मरीजों की मौत, उपचार में लापरवाही के आरोप और मुकदमे दर्ज होने जैसी घटनाओं की चर्चा सामने आती रही है। यदि किसी संस्थान को लेकर शिकायतें या गंभीर घटनाएं पहले भी सामने आई हैं, तो उसके बाद स्वास्थ्य विभाग और संबंधित निगरानी अधिकारियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

सवाल यह है कि ऐसी घटनाओं और शिकायतों के बावजूद यदि किसी संस्थान की व्यवस्था में लगातार सुधार नहीं होता, तो निगरानी तंत्र ने क्या कार्रवाई की?

यदि शिकायतें दर्ज होती रहीं, मामले पुलिस तक पहुंचे, मुकदमे दर्ज हुए और इसके बावजूद संबंधित संस्थानों का नियमित एवं प्रभावी निरीक्षण नहीं हुआ, तो यह केवल अस्पताल संचालक की जवाबदेही का विषय नहीं रह जाता।

स्वास्थ्य विभाग, सीएमओ कार्यालय और स्थानीय स्तर की निगरानी व्यवस्था की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

यदि जांच में अधिकारियों की जानकारी के बावजूद कार्रवाई न करने, निरीक्षण में गंभीर लापरवाही अथवा नियमों की अनदेखी प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

लगातार शिकायतों और घटनाओं के बावजूद निगरानी शून्य रहना आखिर किसकी जवाबदेही है?

यही स्थिति लोगों के बीच आपसी सांठगांठ की आशंका को जन्म देती है। हालांकि किसी अधिकारी, चिकित्सक या संस्थान पर सांठगांठ का आरोप बिना जांच के तथ्य के रूप में नहीं लगाया जा सकता। इसलिए इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वास्तव में लापरवाही कहां हुई और किस स्तर पर हुई।

जिला स्वास्थ्य निगरानी तंत्र की जिम्मेदारी क्या?

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल जिला स्वास्थ्य प्रशासन की भूमिका को लेकर है।

पंजीकृत निजी चिकित्सा संस्थानों की निगरानी, निर्धारित मानकों का पालन, चिकित्सकों एवं स्टाफ की उपलब्धता तथा संबंधित सेवाओं की वैधता की जांच नियमित रूप से होनी चाहिए।

ऐसे में सवाल यह है कि जिले में निजी संस्थानों का निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित है या वास्तव में मौके पर जाकर यह देखा जाता है कि—

पंजीकरण में दर्ज डॉक्टर कौन है, मौके पर कौन मौजूद है और मरीज का उपचार कौन कर रहा है?

निरीक्षण में केवल बोर्ड और प्रमाणपत्र न देखे जाएं

किसी निजी अस्पताल का निरीक्षण केवल बाहर लगे बोर्ड, पंजीकरण प्रमाणपत्र अथवा भवन की स्थिति देखकर पूरा नहीं हो सकता।

निरीक्षण के दौरान मरीजों के रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर, डॉक्टरों की उपस्थिति, स्टाफ की योग्यता, उपकरणों की उपलब्धता, आपातकालीन व्यवस्था और संबंधित वैधानिक रजिस्टरों का भी मिलान किया जाना चाहिए।

विशेष रूप से प्रसव और गर्भसमापन जैसी सेवाओं में कागज पर उपलब्ध डॉक्टर और वास्तविक समय में उपलब्ध डॉक्टर के बीच अंतर है या नहीं, इसकी जांच जरूरी है।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और स्वास्थ्य अधिकारियों की भी तय हो जवाबदेही

निजी अस्पतालों की निगरानी केवल संचालक या पंजीकृत चिकित्सक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बिना योग्य डॉक्टर, प्रशिक्षित स्टाफ या आवश्यक सुविधाओं के चिकित्सा सेवाएं संचालित होती हैं और इसकी जानकारी स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र को होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो जवाबदेही की पूरी श्रृंखला तय की जानी चाहिए।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ सीएमओ कार्यालय, संबंधित पीएचसी और सीएचसी के अधीक्षक अथवा प्रभारी अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए।

खासकर उन मामलों में जहां किसी निजी अस्पताल या क्लीनिक के खिलाफ लगातार शिकायतें मिलती रही हों अथवा वहां कोई गंभीर घटना घटित होती है।

हालांकि किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को केवल पद पर होने के आधार पर स्वतः दोषी नहीं माना जा सकता। जांच में यदि उनकी वैधानिक जिम्मेदारी, जानकारी के बावजूद कार्रवाई न करने अथवा लापरवाही की पुष्टि होती है, तभी नियमानुसार जवाबदेही और कार्रवाई तय की जानी चाहिए।

यदि किसी निजी अस्पताल में प्रसव, गर्भसमापन अथवा उपचार के दौरान गंभीर घटना होती है तो यह भी जांच का हिस्सा होना चाहिए कि संबंधित संस्थान का निरीक्षण कब हुआ था, पिछली शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई, पंजीकरण और सुविधाओं का सत्यापन किस अधिकारी ने किया तथा स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने अपनी निगरानी संबंधी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई।

प्रशासन के सामने पांच बड़े सवाल

1. जिले के प्रत्येक पंजीकृत निजी अस्पताल में दर्ज चिकित्सक की वास्तविक उपस्थिति की जांच कब हुई?

2. क्या पंजीकरण में दर्ज डॉक्टर दूसरे जिले या शहर में नियमित रूप से कार्यरत या निवास करते हैं?

3. डॉक्टर की अनुपस्थिति में प्रसव, सीजर और गर्भसमापन जैसी सेवाएं कौन संचालित करता है?

4. निजी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की योग्यता का भौतिक सत्यापन कितनी बार किया जाता है?

5. क्या जिला स्वास्थ्य विभाग प्रत्येक पंजीकृत संस्थान के निरीक्षण की रिपोर्ट, डॉक्टरों की उपलब्धता और स्वीकृत सेवाओं की डिजिटल निगरानी व्यवस्था लागू करने पर विचार करेगा?

अब समय है डिजिटल निगरानी का

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में डिजिटल रिकॉर्ड और निगरानी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में निजी स्वास्थ्य संस्थानों को केवल पंजीकरण प्रमाणपत्र के भरोसे छोड़ना मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

जिला प्रशासन चाहे तो चरणबद्ध तरीके से निजी अस्पतालों में डिजिटल डॉक्टर अटेंडेंस, स्टाफ रोस्टर, सेवा-वार अनुमति, निरीक्षण रिपोर्ट और पंजीकरण नवीनीकरण की स्थिति को एक जिला स्तरीय निगरानी प्रणाली से जोड़ सकता है।

इससे यह भी स्पष्ट होगा कि जिस डॉक्टर के नाम पर संस्थान पंजीकृत है, वह वास्तव में वहां चिकित्सकीय सेवाएं दे रहा है या केवल कागजों में मौजूद है।

सवाल संस्थान बंद कराने का नहीं, मरीजों की सुरक्षा का है

यह पड़ताल किसी विशेष अस्पताल अथवा चिकित्सक को दोषी ठहराने का निष्कर्ष नहीं है। यदि किसी संस्थान के खिलाफ शिकायत है तो उसका सत्यापन सक्षम स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा रिकॉर्ड और मौके की जांच से होना चाहिए।

लेकिन यदि जांच में कहीं यह सामने आता है कि बिना योग्य चिकित्सक, बिना प्रशिक्षित स्टाफ या बिना आवश्यक सुविधाओं के प्रसव अथवा गर्भसमापन जैसी सेवाएं संचालित हो रही हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा का गंभीर प्रश्न होगा।

अब जरूरत है कि जिला स्वास्थ्य विभाग निजी अस्पतालों की सूची, उनके पंजीकृत चिकित्सकों, स्वीकृत सेवाओं और निरीक्षण की स्थिति की व्यापक समीक्षा करे। शिकायत वाले संस्थानों का अचानक निरीक्षण कराया जाए और जांच में दोष या लापरवाही पाए जाने पर संबंधित संचालक के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी नियमानुसार तय की जाए।

आखिर सवाल सीधा है—यदि पंजीकृत डॉक्टर अस्पताल में मौजूद नहीं हैं, तो मरीजों की जिम्मेदारी कौन उठा रहा है?

और यदि निगरानी तंत्र के बावजूद ऐसी व्यवस्था चलती रहती है, तो जवाबदेही किसकी होगी?

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ANIL TIWARI

Anil Tiwari

Anil Tiwari is a Senior Journalist with extensive experience in print, digital, and television journalism. He has covered a wide range of subjects, including governance, public policy, politics, rural development, environment, illegal mining, law and order, and social issues. His work is driven by factual reporting, investigative journalism, and in-depth analysis, with a strong commitment to public interest and ethical journalism. Over the years, he has consistently highlighted grassroots issues, giving voice to underserved communities through credible and impactful reporting.

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