बांदा में दवा माफियाओं का कथित जाल: कमीशनखोरी, महंगी दवाओं और गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
बांदा। जनपद बांदा में दवा कारोबार को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। विभिन्न सामाजिक संगठनों, मरीजों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिले में कथित रूप से दवा माफियाओं का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय है, जो चिकित्सकों पर विभिन्न माध्यमों से दबाव बनाकर विशेष कंपनियों की दवाएं लिखवाने का प्रयास करता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना शेष है।
आरोप है कि कुछ दवा कारोबारी चिकित्सकों को भ्रमण, प्रचार-प्रसार, प्रोत्साहन अथवा अन्य माध्यमों से प्रभावित कर अपने उत्पाद लिखवाने का प्रयास करते हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कुछ दवाएं निजी स्तर पर तैयार कराकर बाजार में उतारी जाती हैं, जिनकी गुणवत्ता, निर्माण मानकों और वैधानिक प्रमाणन को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि ऐसी दवाओं के संबंध में यह जांच होनी चाहिए कि क्या उनके पास आवश्यक GMP (गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस) प्रमाणन, अधिकृत प्रयोगशाला परीक्षण, वैध लाइसेंस, ट्रेडमार्क तथा अन्य आवश्यक नियामकीय अनुमतियां उपलब्ध हैं या नहीं। यदि किसी उत्पाद में निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया गया है तो संबंधित एजेंसियों द्वारा कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
आरोप यह भी हैं कि इंजेक्शन, सिरप और अन्य दवाओं के मामले में कुछ उत्पादों को ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं की तुलना में कई गुना अधिक कीमत पर बेचा जाता है, जबकि उनकी गुणवत्ता पर सवाल उठाए जाते हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस कथित कमीशन व्यवस्था का आर्थिक बोझ अंततः मरीजों को उठाना पड़ता है।
जिला अस्पताल को लेकर भी उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिला अस्पताल में भी दवा लेखन की व्यवस्था को लेकर लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका दावा है कि अनेक मरीजों को अस्पताल के बाहर से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कुछ मरीजों का यह भी आरोप है कि यदि वे बाहर से निर्धारित दवा नहीं खरीदते, तो उनके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाता है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है तथा इस संबंध में जिला अस्पताल प्रशासन का आधिकारिक पक्ष प्राप्त नहीं हो सका है।
विभागीय कार्रवाई पर भी सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इन आरोपों में तथ्य हैं तो यह केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है। शिकायतकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि कथित अनियमितताओं के बावजूद अब तक औषधि विभाग और जीएसटी विभाग द्वारा व्यापक जांच या प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में औषधि विभाग, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO), जीएसटी विभाग और जिला प्रशासन को संयुक्त रूप से दवा निर्माण, गुणवत्ता, मूल्य निर्धारण, कर अनुपालन तथा आपूर्ति व्यवस्था की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित व्यक्तियों एवं संस्थाओं के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
फिलहाल इन आरोपों पर संबंधित दवा कंपनियों, चिकित्सकों, जिला अस्पताल प्रशासन तथा सरकारी विभागों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हो सकी है। मामले की वास्तविक स्थिति निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।