
Source: Local newspaper - Asha Corruption on recruitment to work
ज्यादातर आशा बहुएं बनीं 'कमीशन एजेंट'! मरीजों को निजी अस्पताल पहुंचाने के आरोपों से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल
विशेष रिपोर्ट- ANIL TIWARI
भारत सरकार ने वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के तहत जिस आशा (ASHA - Accredited Social Health Activist) व्यवस्था की शुरुआत ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को मजबूत बनाने, टीकाकरण बढ़ाने और लोगों तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के उद्देश्य से की थी, उसी व्यवस्था पर अब कई राज्यों और जिलों में गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बड़ी संख्या में आशा बहुएं अब अपने मूल दायित्वों से भटककर निजी अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटरों, अल्ट्रासाउंड केंद्रों और निजी एम्बुलेंस संचालकों के लिए कथित रूप से कमीशन आधारित रेफरल नेटवर्क का हिस्सा बनती जा रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में आम चर्चा यह है कि किसी मरीज या गर्भवती महिला के बीमार होने की सूचना मिलते ही कुछ आशा कार्यकर्ता पहले सरकारी एम्बुलेंस की मदद से मरीज को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) या जिला अस्पताल तक पहुंचाती हैं। इसके बाद विभिन्न बहानों, भय या बेहतर इलाज का भरोसा देकर मरीज और उसके परिजनों को निजी अस्पतालों की ओर भेजने का प्रयास किया जाता है। आरोप यह भी है कि पहले से तय कमीशन के आधार पर मरीज को निजी अस्पताल में भर्ती कराने के बाद संबंधित एजेंटों को आर्थिक लाभ मिलता है।
सरकारी अस्पताल से निजी अस्पताल तक रेफरल का कथित नेटवर्क
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि कई क्षेत्रों में मरीजों को यह कहकर निजी अस्पताल भेजा जाता है कि सरकारी अस्पताल में इलाज संभव नहीं है, डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं या आवश्यक सुविधाएं नहीं हैं। कई मामलों में निजी अल्ट्रासाउंड केंद्र, पैथोलॉजी लैब, डायग्नोस्टिक सेंटर और निजी एम्बुलेंस तक के लिए कथित रूप से रेफरल किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है बल्कि गरीब मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ भी डालता है।
कई बार उठे सवाल, कार्रवाई पर सवालिया निशान
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और मीडिया द्वारा प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। कई जिलों में जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों तक शिकायतें पहुंची हैं। हालांकि शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के आरोप भी लगातार लगते रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी आशा कार्यकर्ता या स्वास्थ्य कर्मचारी द्वारा आर्थिक लाभ के लिए मरीजों को प्रभावित किया जाता है तो ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

आखिर किस उद्देश्य से बनाई गई थी आशा योजना?
आशा कार्यकर्ता योजना की शुरुआत वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के तहत की गई थी। वर्ष 2013 में राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (NUHM) लागू होने के बाद इसका विस्तार शहरी क्षेत्रों तक भी किया गया। वर्तमान में दोनों मिशनों का संचालन राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अंतर्गत किया जाता है।
इस योजना की अवधारणा छत्तीसगढ़ की सफल 'मितानीन' योजना से प्रेरित मानी जाती है।
आशा बहुओं की मूल जिम्मेदारियां
आशा कार्यकर्ता का मुख्य उद्देश्य गांव और स्वास्थ्य विभाग के बीच सेतु बनना है। उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं—
गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण एवं नियमित स्वास्थ्य जांच के लिए प्रेरित करना।
सुरक्षित संस्थागत प्रसव सुनिश्चित करने हेतु महिलाओं को सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचाना।
जननी सुरक्षा योजना एवं अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी देना।
नवजात एवं शिशु स्वास्थ्य की निगरानी करना।
बच्चों का समय पर टीकाकरण सुनिश्चित कराने में सहयोग करना।
माताओं को पोषण, स्तनपान और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना।
परिवार नियोजन संबंधी परामर्श देना।
ओआरएस, आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां, गर्भनिरोधक सामग्री जैसी आवश्यक स्वास्थ्य सामग्री उपलब्ध कराना।
संक्रामक रोगों की जानकारी देना और स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाना।
मूल उद्देश्य से भटकने की चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि आशा कार्यकर्ता देश की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यदि कहीं कमीशन आधारित रेफरल या निजी संस्थानों से अनुचित सांठगांठ जैसी गतिविधियां हो रही हैं, तो इससे पूरी व्यवस्था की साख प्रभावित होती है। इससे ईमानदारी से काम करने वाली हजारों आशा बहुओं की छवि पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
पारदर्शी जांच और निगरानी की आवश्यकता
स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है कि मरीजों के रेफरल सिस्टम को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। सरकारी अस्पतालों से निजी संस्थानों तक भेजे जाने वाले मामलों की नियमित ऑडिट हो, शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि कोई कर्मचारी या आशा कार्यकर्ता नियमों का उल्लंघन करते हुए आर्थिक लाभ के लिए मरीजों को प्रभावित करता पाया जाए तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
साथ ही, आशा कार्यकर्ताओं को उनके मूल दायित्वों, नैतिक जिम्मेदारियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के उद्देश्य के प्रति पुनः प्रशिक्षित करने तथा उनके वैध प्रोत्साहन भुगतान को समय पर उपलब्ध कराने की भी आवश्यकता है, ताकि वे केवल जनहित और स्वास्थ्य सेवा के उद्देश्य से कार्य कर सकें।
नोट: इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप सामान्य शिकायतों और सार्वजनिक विमर्श के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था पर आरोप सिद्ध होना संबंधित सक्षम प्राधिकारी की जांच और निष्कर्ष पर निर्भर करेगा।
