पद का प्रभाव नहीं, कानून सर्वोपरि: हाईकोर्ट ने रद्द की आकृति चौधरी की NSA हिरासत, DM के वेतन से 5 लाख मुआवजे का आदेश
नोएडा श्रमिक आंदोलन मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी; अदालत ने कार्रवाई के आधार और साक्ष्यों पर उठाए गंभीर सवाल
प्रयागराज/नोएडा। नोएडा के श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा एवं सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जारी निरुद्धि आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश भी दिया, बशर्ते किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ्तारी आवश्यक न हो।
मामले में अदालत ने आकृति चौधरी को पांच महीने तक हिरासत में रखे जाने के लिए 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, न्यायालय ने यह राशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के वेतन से अदा किए जाने का निर्देश दिया है।
हिंसा से पहले हिरासत में लिए जाने का उठा सवाल
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन से जुड़ा है। मजदूर वेतन बढ़ाने सहित विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। 13 अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान हिंसा की घटनाएं हुई थीं। पुलिस और प्रशासन की ओर से आकृति चौधरी समेत कुछ लोगों पर हिंसा भड़काने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने के आरोप लगाए गए थे।
आकृति की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उन्हें कथित हिंसा की घटना से पहले ही हिरासत में ले लिया गया था। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासन से NSA के तहत निरुद्धि के आधार और उसके समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य पेश करने को कहा। रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत के समक्ष आरोपों के समर्थन में अपेक्षित सामग्री प्रस्तुत नहीं की जा सकी।
अदालत ने प्रशासन की कार्रवाई पर उठाए गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से पेश किए गए घटनाक्रम और निरुद्धि के आधार पर गंभीर सवाल उठाए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने राज्य की कहानी को मनगढ़ंत बताते हुए NSA के तहत की गई कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
यह फैसला निवारक निरुद्धि कानून के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। खास तौर पर तब, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने के लिए गंभीर आरोप लगाए जाते हैं और उन आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य अदालत के समक्ष रखना आवश्यक होता है।
DM के वेतन से मुआवजे का आदेश क्यों महत्वपूर्ण?
इस मामले का सबसे चर्चित पहलू 5 लाख रुपये के मुआवजे की वसूली से जुड़ा है। सामान्य तौर पर गलत हिरासत या अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में मुआवजा राज्य या संबंधित संस्था से दिए जाने के आदेश सामने आते हैं। लेकिन इस मामले में अदालत ने राशि जिलाधिकारी मेधा रूपम के वेतन से अदा किए जाने का निर्देश दिया है।
इस निर्देश ने प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर भी व्यापक बहस छेड़ दी है। संदेश साफ है कि प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही होना चाहिए।
मेधा रूपम कौन हैं?
मेधा रूपम उत्तर प्रदेश कैडर की 2014 बैच की आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वह भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं।
हालांकि, इस पारिवारिक संबंध का उल्लेख केवल उनके परिचय के संदर्भ में है। हाईकोर्ट का आदेश आकृति चौधरी की NSA हिरासत और उससे संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई पर केंद्रित है।
पत्रकार सत्यम वर्मा पर भी लगा था NSA
इसी श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में पत्रकार सत्यम वर्मा समेत अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, सत्यम वर्मा पर भी NSA के तहत कार्रवाई हुई थी।
ब्यूरोक्रेसी के लिए अहम न्यायिक संदेश
हाईकोर्ट के इस आदेश को प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक स्वतंत्रता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मामला यह संदेश देता है कि पद, अधिकार अथवा प्रशासनिक शक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकती। किसी भी कठोर कानून का इस्तेमाल करते समय प्रक्रिया, साक्ष्य और संवैधानिक अधिकारों का पालन आवश्यक है।
आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द होने का अर्थ यह नहीं है कि उनसे जुड़े अन्य आपराधिक मामले स्वतः समाप्त हो गए हैं। हाईकोर्ट का मौजूदा आदेश विशेष रूप से NSA के तहत उनकी निरुद्धि से संबंधित है।