अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग क्यों तेज हो रही है ?
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से क्यों पीछे रह गया ?
बांदा। देश के सबसे अधिक प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्रों में शामिल बुंदेलखंड में एक बार फिर पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग तेज होती दिखाई दे रही है। सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों, युवाओं और क्षेत्रीय मंचों का कहना है कि दशकों से चली आ रही उपेक्षा, सीमित औद्योगिक विकास, लगातार पलायन, केंद्रीय संस्थानों की कमी और क्षेत्रीय असंतुलन ने अलग राज्य की मांग को नई मजबूती दी है।
बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई जिलों में फैला एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षेत्र है। यह क्षेत्र देश को बड़ी मात्रा में खनिज, निर्माण सामग्री और प्राकृतिक संपदा उपलब्ध कराता है, लेकिन विकास के अधिकांश मानकों पर आज भी अपेक्षाकृत पिछड़ा माना जाता है।
प्राकृतिक संसाधनों का भंडार, लेकिन विकास में पिछड़ापन
बुंदेलखंड को देश के महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां से उच्च गुणवत्ता की गिट्टी, बालू, पत्थर, ग्रेनाइट, सीमेंट उद्योग के लिए आवश्यक खनिज, जिप्सम सहित अनेक निर्माण सामग्री बड़े पैमाने पर देश के विभिन्न राज्यों तक पहुंचती है। हाल ही में महोबा क्षेत्र में जिरकोनियम के भंडार मिलने के बाद इस क्षेत्र का सामरिक और औद्योगिक महत्व और बढ़ गया है।
बुंदेलखंड की प्राकृतिक संपदा की बात करें तो यह क्षेत्र केवल निर्माण सामग्री तक सीमित नहीं है। बांदा से सटे मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की पहचान देश के प्रमुख प्राकृतिक हीरा उत्पादक क्षेत्र के रूप में है। यहां की धरती से निकलने वाले बहुमूल्य हीरों ने वर्षों से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान दिया है, लेकिन विडंबना यह है कि इस क्षेत्र के अधिकांश किसान और स्थानीय निवासी आर्थिक समृद्धि से वंचित रहे। बड़ी संख्या में लोग आज भी खेती और मजदूरी पर निर्भर हैं। क्षेत्रीय संगठनों का आरोप है कि प्राकृतिक संपदा का लाभ स्थानीय विकास तक नहीं पहुंच सका और सरकारी उपेक्षा के कारण यहां के लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में पलायन करने को मजबूर हुए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक एवं स्थानीय हितों को ध्यान में रखकर उपयोग किया जाए तो बुंदेलखंड देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल हो सकता है। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि संसाधनों का दोहन तो हुआ, परंतु उसके अनुपात में क्षेत्र को निवेश, रोजगार और आधारभूत सुविधाएं नहीं मिलीं।
लगातार बढ़ता पलायन बना सबसे बड़ा संकट
बुंदेलखंड का सबसे गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकट लगातार बढ़ता पलायन है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में लाखों युवा दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, सूरत, अहमदाबाद, पुणे और मुंबई जैसे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए हैं।
स्थानीय रोजगार के अवसर सीमित होने से गांवों की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हुई हैं। कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, सिंचाई संबंधी चुनौतियां और औद्योगिक विकास की कमी ने युवाओं के सामने विकल्प सीमित कर दिए हैं।
बैंकिंग व्यवस्था और कम सीडी रेशियो पर सवाल
क्षेत्र के उद्यमियों और व्यापारिक संगठनों का कहना है कि बुंदेलखंड में लंबे समय से बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) रेशियो अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया। स्थानीय स्तर पर जमा होने वाली पूंजी के अनुपात में उद्योग, व्यापार, कृषि आधारित उद्योगों और स्वरोजगार के लिए पर्याप्त ऋण उपलब्ध नहीं कराया गया।
यदि समय पर स्थानीय उद्यमियों, एमएसएमई, स्टार्टअप और कृषि आधारित उद्योगों को वित्तीय सहायता मिलती, तो बड़ी संख्या में युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलता और पलायन में कमी आती।
केंद्रीय संस्थानों की कमी भी बड़ा मुद्दा
अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वाले संगठनों का कहना है कि इतने विशाल भौगोलिक क्षेत्र और बड़ी आबादी के बावजूद बुंदेलखंड को केंद्रीय स्तर की संस्थाओं में अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिली।
आज भी क्षेत्र में लंबे समय से निम्न संस्थानों की मांग उठती रही है—
एम्स (AIIMS)
पीजीआई स्तर का सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सा संस्थान
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT)
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT)
रेल कोच फैक्ट्री
बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक उपक्रम
उर्वरक एवं कृषि आधारित उद्योग (इफको जैसी परियोजनाएं)
रक्षा एवं विनिर्माण क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयां
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इन संस्थानों की स्थापना समय रहते होती, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, उद्योग और रोजगार के नए अवसर विकसित हो सकते थे।
पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत की अनदेखी
बुंदेलखंड केवल खनिज संपदा का क्षेत्र नहीं बल्कि ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। खजुराहो, कालिंजर दुर्ग, चित्रकूट, ओरछा, पन्ना टाइगर रिजर्व, देवगढ़, केन-बेतवा क्षेत्र सहित अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थल राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखते हैं।
इसके बावजूद पर्यटन अवसंरचना, होटल उद्योग, परिवहन, स्थानीय हस्तशिल्प और पर्यटन आधारित रोजगार को अपेक्षित बढ़ावा नहीं मिल पाया।
बुंदेली भाषा और सांस्कृतिक पहचान
अलग राज्य की मांग में बुंदेली भाषा, लोक संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य, साहित्य और ऐतिहासिक विरासत भी महत्वपूर्ण आधार हैं। समर्थकों का कहना है कि पृथक राज्य बनने से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक संरक्षण और संस्थागत बढ़ावा मिल सकेगा।
संसाधन बनाम विकास का सवाल
अलग बुंदेलखंड की मांग करने वाले संगठन यह प्रश्न उठाते हैं कि जो क्षेत्र पूरे देश को खनिज, निर्माण सामग्री और प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराता है, वही क्षेत्र उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और रोजगार जैसे बुनियादी विकास संकेतकों में पीछे क्यों है।
उनका कहना है कि यदि प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त राजस्व का पर्याप्त हिस्सा स्थानीय विकास, सिंचाई परियोजनाओं, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता, तो आज बुंदेलखंड की तस्वीर पूरी तरह अलग होती।
क्या अलग राज्य समाधान है?
पृथक बुंदेलखंड राज्य के समर्थकों का मानना है कि नया राज्य बनने से प्रशासनिक निर्णय स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लिए जा सकेंगे, संसाधनों का बेहतर प्रबंधन होगा, निवेश बढ़ेगा, उद्योग स्थापित होंगे और युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नया राज्य बनना ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ प्रभावी प्रशासन, पारदर्शी शासन, औद्योगिक नीति, जल प्रबंधन, कृषि सुधार, निवेश और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार भी समान रूप से आवश्यक होगा।
बुंदेलखंड आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, हीरे से लेकर जिरकोनियम जैसे बहुमूल्य खनिजों की उपलब्धता और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद यह क्षेत्र लंबे समय से अपेक्षित विकास से वंचित रहा है। लगातार पलायन, केंद्रीय संस्थानों का अभाव, सीमित औद्योगिक निवेश, बैंकिंग प्रणाली की कमजोर भागीदारी और क्षेत्रीय असंतुलन ने अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग को नई ऊर्जा दी है।
अब यह केवल एक राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास, संसाधनों पर स्थानीय भागीदारी, रोजगार, सांस्कृतिक पहचान और संतुलित विकास से जुड़ा व्यापक विमर्श बन चुका है। आने वाले समय में केंद्र और संबंधित राज्य सरकारें इस मांग को किस दृष्टिकोण से देखती हैं, इस पर बुंदेलखंड के भविष्य की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।